प्रेम करने से नहीं होता है. होने से होता है. जब हो जाता है. आदमी हर पल इससे जुड़ा अच्छा-बुरा सोचता है. प्रेम होने और खत्म होने के बस दो पल है. पहला पल जिस वक्त आपको प्यार हुआ हो . दूसरा पल वो जहां एहसास हो जाए कि प्रेम था नहीं या बचा ही नहीं है. प्रेम ना होने के बाद भी जो उम्मीद लगाए रहे वो लोग पहले सूख जाते हैं. फिर मर जाते हैं.
निजी अनुभव से बता रहा हूं. मैं भी इसी प्रक्रिया से गुजरा पहले सूखा शायद मर भी जाऊं. हालांकि मरने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. थोड़े छोटे-मोटे काम हैं जो निपटाने हैं. सूखने से यहां मतलब ये नहीं है कि आदमी सूख के दुबला-पतला हो जाता है.
नहीं, सूखने का मतलब है आंखों के पानी का सूखना. गम की ओस और खुशी का उफनती लहरों का सूख जाना. ये जिसमें सूख जाता है उसे सबकुछ निरस और सूखा लगता है. मैंने महसूस किया है. मैं हर छोटी बड़ी चीज से क्षुब्ध आने लगा हूं. जब लगा कि दिमाग की नसें फटने जैसी होती है तो फिर सोचा कहीं ये सब लिख दिया जाए ताकि सनद रहे कि जिंदगी में कैसे-कैसे लोग मिले...
गणित में फेल हुए लोग कला संकाय की ओर भागते हैं जैसे छोटे अस्पतालों से रेफर किए गए मरीज बड़े अस्पतालों की ओर भागते हैं. ऐसे ही प्रेम में हारे हुए पुरुष अध्यात्म की ओर भागते हैं.
खैर, मैं लोगों का भी दोष नहीं देता अपने कर्मों का भी दोष होता है. लोग गलत नहीं होते, अलग होते हैं. मुझे मेरे जैसा शायद कोई नहीं मिला. मिल भी होगा तो जल्दी में पीछे छूट गया होगा. और अब ऐसे लोगों को वापस बुलाना भी मुश्किल भरा है . बिछड़े लोग नहीं आते हैं. आपके मरने पर भी नहीं. वो कहीं किसी शहर में आपके मरने की खबर पर आंख बंद कर लेंगे और फिर गुनगुनाने लगेंगे.
किसी ने कहा है कि मरने वाले को ये पता चल जाए कि दुनिया उसे कितनी आसानी से भूल जाएगी तो वह दुनिया से नफरत करने लगे...
निजी अनुभव से बता रहा हूं. मैं भी इसी प्रक्रिया से गुजरा पहले सूखा शायद मर भी जाऊं. हालांकि मरने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. थोड़े छोटे-मोटे काम हैं जो निपटाने हैं. सूखने से यहां मतलब ये नहीं है कि आदमी सूख के दुबला-पतला हो जाता है.
नहीं, सूखने का मतलब है आंखों के पानी का सूखना. गम की ओस और खुशी का उफनती लहरों का सूख जाना. ये जिसमें सूख जाता है उसे सबकुछ निरस और सूखा लगता है. मैंने महसूस किया है. मैं हर छोटी बड़ी चीज से क्षुब्ध आने लगा हूं. जब लगा कि दिमाग की नसें फटने जैसी होती है तो फिर सोचा कहीं ये सब लिख दिया जाए ताकि सनद रहे कि जिंदगी में कैसे-कैसे लोग मिले...
गणित में फेल हुए लोग कला संकाय की ओर भागते हैं जैसे छोटे अस्पतालों से रेफर किए गए मरीज बड़े अस्पतालों की ओर भागते हैं. ऐसे ही प्रेम में हारे हुए पुरुष अध्यात्म की ओर भागते हैं.
कभी किसी के लिए खत लिखा है ? मैंने लिखा है लेकिन उन चिट्ठियों का कोई जवाब नहीं आया. वो शून्य में जाती थी किसी बड़े शून्य में. जहां उनका कोई मतलब ही नहीं था. उनका कोई मोल ही नहीं था. ना उन्हें चूहों ने कतरा ना किसी ने फिर से हाथ फेरकर उन्हें सहेजा. जानते हो क्या हुआ. उन खतों का दम घुट गया . वो मर गए , हां उन खतों ने दम तोड़ दिया.

खैर, मैं लोगों का भी दोष नहीं देता अपने कर्मों का भी दोष होता है. लोग गलत नहीं होते, अलग होते हैं. मुझे मेरे जैसा शायद कोई नहीं मिला. मिल भी होगा तो जल्दी में पीछे छूट गया होगा. और अब ऐसे लोगों को वापस बुलाना भी मुश्किल भरा है . बिछड़े लोग नहीं आते हैं. आपके मरने पर भी नहीं. वो कहीं किसी शहर में आपके मरने की खबर पर आंख बंद कर लेंगे और फिर गुनगुनाने लगेंगे.
किसी ने कहा है कि मरने वाले को ये पता चल जाए कि दुनिया उसे कितनी आसानी से भूल जाएगी तो वह दुनिया से नफरत करने लगे...

