आठ साल की उम्र में पहली गुल्लक दशहरे के मेले में खरीदी. कुछ सिक्के जमा ही हुए थे कि अचानक एक दिन गुल्लक टूट गई . तब से आज तक गुल्लक की तरह मेरी आकांक्षाएं टूटती आईं हैं। 25 साल लग गया आदमी को ये समझने में कि किसके सामने कितना खर्च होना है.
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ जिसके लिए मैं खर्च होता आया उन सभी के लिए यह महज एक वाकया भर है. अदना सा मदारी जो खेल दिखाया. आया और गया. जो मेरे लिए खर्च होना चाहता था उसके लिए मेरी तरफ से कुछ था ही नहीं.
जब इच्छाएं कम होती जाती हैं तो सिर पर एक साफ आसमान होता है. वहां कोई ख्वाहिश नहीं होती है. सब मालूम सा होता है. क्या हो सकता है. क्या किया जा सकता है.
गुल्लक बड़ा सटीक सा शब्द है जिससे काफी कुछ सीखा मैंने. बचपन से बड़ा होने तक 8-10 गुल्लक तो हाथ से फिसलकर गिरे ही होंगे. गिरे तो टूटे भी. ऐसे ही आदमी भी गिरता है. कभी अपनी नजर में गिरता है कभी दूसरों की नजर में .
इस टूटने की आवाज भी नहीं होती है. टूटना और जुड़ना भी तो यादों की गुल्लक में जाता है ना. इस दुनिया में स्मृतियां ही तो नहीं मरती. गुल्लक टूटने के साथ-साथ खुद का भी टूटना याद है. इसकी आवृति इतनी रही कि टूटने की आवाज और आंख से आंसू दोनों गुम हो गए. हैरतें भी कम होने लगी. टूटने की आदत सी है. नाराजगी तो किसी गहरे शून्य में चली गई है. सारी शिकायत, नाराजगी खुद से है.
खुद से खुद का लड़ना. खुद को समझाना. खुद को डपटना और सिखाना . यही चल रहा है. जो अच्छा लगे लिखता जाऊंगा. क्योंकि स्मृतियां इस दुनिया में मरती नहीं. इन सबका कुल जमा मेरे पास गुल्लक ही है...


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