बुधवार, 6 मई 2020

वो शायद सूख गया या मर गया ...

प्रेम करने से नहीं होता है. होने से होता है. जब हो जाता है. आदमी  हर पल इससे जुड़ा अच्छा-बुरा सोचता है. प्रेम होने और खत्म होने के बस दो पल है. पहला पल जिस वक्त आपको प्यार हुआ हो . दूसरा पल वो जहां एहसास हो जाए कि प्रेम था नहीं या बचा ही नहीं है.  प्रेम ना होने के बाद भी जो उम्मीद लगाए रहे वो लोग पहले सूख जाते हैं. फिर मर जाते हैं.

निजी अनुभव से बता रहा हूं. मैं भी इसी प्रक्रिया से गुजरा पहले  सूखा शायद मर भी जाऊं. हालांकि मरने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. थोड़े छोटे-मोटे काम हैं जो निपटाने हैं. सूखने से यहां मतलब ये नहीं है कि आदमी सूख के दुबला-पतला हो जाता है.

 नहीं, सूखने का मतलब है आंखों के पानी का सूखना. गम की ओस  और खुशी का उफनती लहरों का सूख जाना. ये जिसमें सूख जाता है उसे सबकुछ निरस और सूखा लगता है. मैंने महसूस किया है. मैं हर छोटी बड़ी चीज से क्षुब्ध आने लगा हूं. जब लगा कि दिमाग की नसें फटने जैसी होती है तो फिर सोचा कहीं  ये सब लिख दिया जाए ताकि  सनद रहे कि जिंदगी में कैसे-कैसे लोग मिले...

गणित में फेल हुए लोग कला संकाय की ओर भागते हैं जैसे छोटे अस्पतालों से रेफर किए गए मरीज बड़े अस्पतालों की ओर भागते हैं. ऐसे ही प्रेम में हारे हुए पुरुष अध्यात्म की ओर भागते हैं.


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कभी किसी के लिए खत लिखा है ? मैंने लिखा है लेकिन उन चिट्ठियों का कोई जवाब नहीं आया. वो शून्य में जाती थी किसी बड़े शून्य में. जहां उनका कोई मतलब ही नहीं था. उनका कोई मोल ही नहीं था. ना उन्हें चूहों ने कतरा ना किसी ने फिर से हाथ फेरकर उन्हें सहेजा. जानते हो क्या हुआ. उन खतों का दम घुट गया . वो मर गए , हां उन खतों ने दम तोड़ दिया.
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खैर, मैं लोगों का भी दोष नहीं देता अपने कर्मों का भी दोष होता है. लोग गलत नहीं होते, अलग होते हैं.  मुझे मेरे जैसा शायद कोई नहीं मिला. मिल भी होगा तो जल्दी में पीछे छूट गया होगा. और अब ऐसे लोगों को  वापस बुलाना भी मुश्किल भरा है . बिछड़े लोग नहीं आते हैं. आपके मरने पर भी नहीं. वो कहीं किसी शहर में आपके मरने की खबर पर आंख बंद कर लेंगे और फिर गुनगुनाने लगेंगे.

किसी ने कहा है कि मरने वाले को ये पता चल जाए कि दुनिया उसे कितनी आसानी से भूल जाएगी तो वह दुनिया से नफरत करने लगे...

रविवार, 3 मई 2020

कुला जमा... गुल्लक ही है


आठ साल की उम्र में पहली गुल्लक दशहरे के मेले में खरीदी. कुछ सिक्के जमा ही हुए थे कि अचानक एक दिन गुल्लक टूट गई . तब से आज तक गुल्लक की तरह मेरी आकांक्षाएं टूटती आईं हैं। 25 साल लग गया  आदमी को ये समझने में कि किसके सामने कितना खर्च होना है. 
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ जिसके लिए मैं खर्च होता आया उन सभी के लिए यह महज एक वाकया भर है. अदना सा मदारी जो खेल दिखाया. आया और गया. जो मेरे लिए खर्च होना चाहता था उसके लिए मेरी तरफ से कुछ था ही नहीं.

 जब इच्छाएं कम होती जाती हैं तो सिर पर एक साफ आसमान होता है. वहां कोई ख्वाहिश नहीं होती है. सब मालूम सा होता है. क्या हो सकता है. क्या किया जा सकता है. 
गुल्लक बड़ा सटीक सा शब्द है जिससे काफी कुछ सीखा मैंने. बचपन से बड़ा होने तक 8-10 गुल्लक तो हाथ से फिसलकर गिरे ही होंगे. गिरे तो टूटे भी. ऐसे ही आदमी भी गिरता है. कभी अपनी नजर में गिरता है कभी दूसरों की नजर में . 
इस टूटने की आवाज भी नहीं होती है. टूटना और जुड़ना भी तो यादों की गुल्लक में जाता है ना. इस दुनिया में स्मृतियां ही तो नहीं मरती.  गुल्लक  टूटने के साथ-साथ खुद का भी टूटना याद है. इसकी आवृति इतनी रही कि टूटने की आवाज और आंख से आंसू दोनों गुम हो गए. हैरतें भी कम होने लगी. टूटने की आदत सी है. नाराजगी तो किसी गहरे शून्य में चली गई है. सारी शिकायत, नाराजगी खुद से है.
खुद से खुद का लड़ना. खुद को समझाना. खुद को डपटना और सिखाना . यही चल रहा है. जो अच्छा लगे लिखता जाऊंगा. क्योंकि स्मृतियां इस दुनिया में मरती नहीं. इन सबका कुल जमा मेरे पास गुल्लक ही है...